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अहोई अष्टमी का व्रत

बहुत पुरानी बात है ! एक नगर में एक साहूकार रहता था ! उसके सात बेटे थे ! एक बार दीवाली से सात दिन पहले साहूकार की पत्नी घर का आँगन लीपने के लिए नदी के पास से मिट्टी लेने गयी ! जिस जगह वह मिट्टी खोद रही थी, वहीं एक साही (Porcupine) का बिल था !

(साही को किसी-किसी स्थान पर स्याहू तथा सेहू या सेह कहा जाता है ! पर सभी में मतलब एक ही होता है !)
साहूकार की पत्नी की कुदाल की चोट लगने से, साही का बच्चा मर गया ! कुदाल में खून लगा देख साहूकार की पत्नी को यह पता चला तो वह बहुत दुखी हुई, किन्तु तभी साही - जो बिल से बाहर भोजन का प्रबन्ध करने गयी थी, वहाँ आ गयी !
साही ने अपने बच्चे को मृत देख साहूकार की पत्नी से कहा कि जो दुःख तूने मुझे दिया है, वही दुःख तुझे भी भुगतना पड़ेगा !
इस घटना के कुछ ही दिनों बाद साहूकार के एक पुत्र की मृत्यु हो गयी ! फिर एक-एक करके उसके बाकी छः पुत्र भी उसी वर्ष परलोक सिधार गये ! अपने सभी बच्चों को खोकर साहूकार की पत्नी दिन रात दुखी रहने लगी ! आस-पास रहने वाली सखी-सहेलियों को साहूकार की पत्नी ने बताया कि उसकी कुदाल लगने से एक साही का बच्चा मर गया ! उसी साही का शाप उसे लग गया और उसके सातों बेटे एक-एक करके मर गये !

साहूकार की पत्नी की दुःख भरी कथा पास ही रहने वाली एक धर्मपरायण वृद्ध ब्राह्मणी ने भी सुनी ! उसने साहूकार की पत्नी से कहा - "तुमने जान-बूझ कर जीव ह्त्या का पाप नहीं किया है ! फिर भी तुमसे जो हुआ - उसका तुम्हें दुःख है ! तुम्हारे पश्चाताप से तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है ! अब अगर तुम प्रायश्चित भी करना चाहती हो तो कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन अहोई माता का व्रत करो ! उस दिन साही और उसके बच्चे का चित्र बनाकर उनकी पूजा करो ! उनसे क्षमा याचना करो ! अहोई माता की कृपा से तुम्हारे सारे दुःख दूर हो जायेंगे और तुम्हें फिर से तुम्हारी सन्तान मिल जायेंगी !

साहूकार की पत्नी ने वैसा ही किया, जैसा वृद्ध ब्राह्मणी ने कहा था ! फिर वह हर वर्ष अहोई माता की पूजा और व्रत करने लगी ! अहोई माता की कृपा से साहूकार की पत्नी के फिर से एक-एक करके सात बेटे हुए, जिनकी शक्लें हुबहू उसके मरे हुए बेटों जैसी थी !

साहूकारनी को लगा - अहोई माता की कृपा से जैसे उसके मरे हुए बेटे फिर से उसे मिल गये हों ! साहूकार की पत्नी द्वारा अहोई माता के व्रत का पुण्य प्रताप जानकर अन्य महिलायें भी पुत्र प्राप्ति के लिए अथवा अपने पुत्रों की रक्षा के लिए अहोई माता का व्रत करने लगीं !